साल 1975, फिल्म का नाम था शोले। डायरेक्टर रमेश सिप्पी को उम्मीद थी कि उनकी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा देगी। लेकिन जब फिल्म रिलीज़ हुई, तो सिनेमाघर खाली रहे। क्रिटिक्स ने इसे फ्लॉप करार दिया। रमेश सिप्पी के लिए यह सदमे जैसा था। उन्होंने इस फिल्म में अपना सब कुछ झोंक दिया था।
फिल्म को बचाने की जिद:
हालात ऐसे बन गए कि सिप्पी ने फिल्म का क्लाइमेक्स बदलने का भी मन बना लिया। लेकिन तभी वक्त ने पलटी मारी। फिल्म के गाने ‘कोई हसीना जब रूठ जाती है’ और ‘जब तक है जान’ लोकप्रिय होने लगे, और धीरे-धीरे दर्शकों का रुझान भी बढ़ने लगा। इसके बाद अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और संजीव कुमार स्टारर यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार और ऐतिहासिक फिल्मों में से एक बन गई।
शोले की टिकट का वायरल किस्सा:
हाल ही में सोशल मीडिया पर शोले की टिकट वायरल हुई, जिसमें उस दौर की टिकट की कीमतें चर्चा का विषय बन गईं।
बैक स्टॉल: ₹1.50 से ₹2.00
मिडल स्टॉल: ₹2.50
बालकनी (सबसे महंगी): ₹3.00
फिल्म का खर्चा:
शोले बनाने में उस वक्त 3 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इसमें से 20 लाख रुपए सिर्फ कास्टिंग पर खर्च हुए। रमेश सिप्पी ने कहा था कि अगर आज शोले बनाई जाती, तो इसका बजट लगभग 150 करोड़ रुपए होता, और 100 करोड़ तो केवल स्टारकास्ट पर खर्च हो जाते।
शोले के दिलचस्प किस्से:
शोले ने बॉक्स ऑफिस पर 35 करोड़ रुपए की कमाई की थी, जो आज के हिसाब से 1500 करोड़ से अधिक होती।
यह फिल्म लगातार 5 साल तक सिनेमाघरों में चलती रही।
मुंबई के मिनर्वा थिएटर में इसे 286 हफ्तों तक दिखाया गया, जो एक रिकॉर्ड है।
फिल्म की शूटिंग में असली गोलियों का इस्तेमाल किया गया। धर्मेंद्र ने गलती से असली गोली चला दी, जो अमिताभ बच्चन के कान को छूकर निकल गई।
धर्मेंद्र जानबूझकर हेमा मालिनी के साथ रोमांटिक सीन में गलतियां करते थे ताकि सीन दोबारा शूट करना पड़े।
फिल्म की शूटिंग रामनगर (कर्नाटक) में हुई थी, जिसे अब “शोले हिल्स” के नाम से जाना जाता है।
गब्बर सिंह का किरदार बागी डाकू गब्बर सिंह गुर्जर से प्रेरित था, जो 1950 के दशक में चंबल घाटी में सक्रिय था।
मशहूर डायलॉग्स:
फिल्म के डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर हैं:
“कितने आदमी थे?”
“जो डर गया, समझो मर गया।”
“बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना।”
“ये हाथ हमें दे दे ठाकुर।”
शोले न सिर्फ एक फिल्म, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर बन गई।
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