गणतंत्र दिवस परेड में शुक्रवार को तेलंगाना की झांकी में उन आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत के प्रति सम्मान को दर्शाया गया जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मार्गदर्शक बनकर सामने आए थे।
झांकी में कोमाराम भीम, रामजी गोंड और चित्याललम्मा (चकलिल्लम्मा) जैसे नेताओं के वीरतापूर्ण प्रयासों की झलक दिखाई गई, जिनकी अदम्य भावनाएं इस क्षेत्र की लोककथाओं का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं।
कोमाराम भीम और रामजी गोंड अपने जीवकाल में हमेशा स्वदेशी आदिवासी समुदायों की स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकारों की पैरवी करते रहे।
उन्होंने व्यापक समर्थन हासिल करने के लिए ”जल, जंगल, जमीन” के नारे में समाहित सशक्तीकरण और न्याय का एक शक्तिशाली संदेश दिया और गुरिल्ला युद्ध रणनीति भी अपनाई।
चकलिल्लम्मा, सामंती जमींदारों के अधीन खेती करने वालों और किसानों के शोषण की गवाह थीं। उनके दृढ़ संकल्प ने इन समुदायों को उत्पीड़न करने वालों का मुकाबला करने और चुनौती देने के लिए प्रेरित किया।
आधुनिक समय में ग्राम सभाओं और पंचायतों की स्थापना इन स्वतंत्रता सेनानियों के स्थायी प्रभाव के प्रमाण हैं।
ये जमीनी स्तर की संस्थाएं स्थानीय आदिवासी आबादी को सशक्त बनाती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि ‘जल, जंगल और ज़मीन’ पर उनके उचित दावों को मान्यता दी जाए तथा संरक्षित भी किया जाए।
– एजेंसी
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