बदलती जीवनशैली, हार्मोनल असंतुलन और बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं में बच्चेदानी का कैंसर (Uterine Cancer / Endometrial Cancer) तेजी से उभरती स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो इसका उपचार न केवल संभव है, बल्कि पूरी तरह सफल भी हो सकता है।
दुखद पहलू यह है कि कई महिलाएं इन लक्षणों को मामूली शारीरिक बदलाव समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, और जब तक सही जांच होती है, तब तक बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है।
क्या होता है बच्चेदानी का कैंसर?
बच्चेदानी (गर्भाशय) का कैंसर तब होता है जब गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं। यह कैंसर आमतौर पर मेनोपॉज के बाद की महिलाओं में पाया जाता है, लेकिन आजकल 35–45 की उम्र की महिलाएं भी इसकी चपेट में आ रही हैं।
बच्चेदानी के कैंसर के 6 शुरुआती लक्षण, जिन्हें नजरअंदाज न करें:
1. असामान्य योनि से रक्तस्राव
मेनोपॉज के बाद रक्तस्राव होना या पीरियड्स के बीच में बार-बार ब्लीडिंग आना गर्भाशय कैंसर का पहला और सबसे आम संकेत हो सकता है।
2. पेल्विक क्षेत्र में दर्द या दबाव
निचले पेट या पेल्विक हिस्से में लगातार दर्द, भारीपन या दबाव महसूस होना चिंताजनक संकेत हो सकता है।
3. सफेद या बदबूदार योनि स्राव
असामान्य रंग, मात्रा या गंध वाला डिस्चार्ज संक्रमण नहीं, बल्कि कैंसर का भी संकेत हो सकता है।
4. बार-बार पेशाब आना या पेशाब में जलन
अगर बिना कारण बार-बार पेशाब आता है या उसमें दर्द महसूस होता है, तो यह भी गर्भाशय से जुड़ी किसी समस्या का संकेत हो सकता है।
5. वज़न घटना बिना किसी वजह के
यदि अचानक वजन कम हो रहा है, भूख कम हो गई है और थकावट बनी रहती है, तो यह शरीर में किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है।
6. यौन संबंधों के दौरान दर्द
सेक्स के दौरान असहजता या दर्द महसूस होना, खासतौर पर मेनोपॉज के बाद, गर्भाशय के कैंसर से जुड़ा लक्षण हो सकता है।
किन महिलाओं को है ज्यादा खतरा?
मेनोपॉज के बाद की महिलाएं
मोटापा या डायबिटीज़ से ग्रस्त महिलाएं
जिन्हें लंबे समय तक एस्ट्रोजन थैरेपी मिली हो
परिवार में किसी को गर्भाशय या आंत का कैंसर रहा हो
अनियमित पीरियड्स या पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) से पीड़ित महिलाएं
समय रहते जांच और इलाज है जरूरी
गर्भाशय के कैंसर की पुष्टि के लिए पेल्विक जांच, अल्ट्रासाउंड, एंडोमेट्रियल बायोप्सी और MRI/CT स्कैन जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जाता है। अगर प्रारंभिक अवस्था में ही बीमारी पकड़ में आ जाए तो सर्जरी, रेडिएशन या कीमोथेरेपी से इलाज संभव है।
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