राजकुमार राव और वामिका गब्बी की नई फिल्म “भूल चूक माफ” देखने में थोड़ी देर जरूर हुई, लेकिन फिल्म की आत्मा इतनी गहरी है कि उसके असर से बचना मुश्किल है। और चूंकि फिल्म की कहानी भी “भूल” और “माफी” के भाव पर टिकी है, तो रिव्यू में देरी के लिए भी माफी बनती है।
❤️ जब दिल दुखाना बना सबसे बड़ी बाधा
फिल्म में राजकुमार राव ने ‘रंजन तिवारी’ का किरदार निभाया है, जिसे ‘तितली मिश्रा’ यानी वामिका गब्बी से मोहब्बत हो जाती है। शादी की तारीख तय है, लेकिन जैसे-जैसे दिन नजदीक आता है, शादी में अड़चनें बढ़ती जाती हैं। और इन सबके बीच एक रहस्यमयी नाम उभरता है – हामिद अंसारी।
कौन है ये अंसारी? क्यों बना है रंजन और तितली की शादी में बाधा?
यही है फिल्म की असली पहेली।
💡 जज्बातों और सामाजिक मुद्दों से जुड़ी कहानी
फिल्म एक रोमांटिक कॉमेडी के तौर पर शुरू होती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सिस्टम की विसंगतियों और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों से गहराई से जुड़ जाती है।
रंजन को नौकरी मिलती है, लेकिन घूस देकर। जबकि हामिद अंसारी जैसे पात्र, जो योग्य और ईमानदार हैं, सिस्टम की अनदेखी का शिकार हो जाते हैं।
🌊 गंगा किनारे की वो मुलाकात, जिसने रंजन की सोच बदल दी
जब रंजन तिवारी निराश होकर गंगा में कूदने की सोचता है, तभी उसकी मुलाकात होती है उसी हामिद अंसारी से। एक बेरोजगार, जो समाज और गांव के लिए कुछ करना चाहता था। परीक्षा पास करने के बावजूद उसे नौकरी नहीं मिली, क्योंकि कोई और पैसे देकर उसकी जगह ले गया।
यही मोड़ रंजन के आत्मबोध का कारण बनता है। उसे अहसास होता है कि उसकी मन्नत पूरी नहीं हो रही क्योंकि उसका कर्म गलत था। वह हामिद को लेकर नौकरी दिलवाने वाले दलाल ‘भगवान दास’ के पास जाता है – और वहां से शुरू होता है आत्मग्लानि और सुधार का रास्ता।
🎭 अभिनय, बनारसी रंग और सामाजिक संदेश
फिल्म का बैकग्राउंड वाराणसी का है – और बनारस की हर गली, घाट, चिलम, साधु, गाय और गंगा की मस्ती इसमें खूबसरती से रची-बसी है।
राजकुमार राव और वामिका गब्बी की केमिस्ट्री सहज, मजबूत और भावनात्मक है।
संजय मिश्रा का किरदार ‘भगवान दास’ अंत में जो भाषण देता है, वह दिल झकझोर देता है।
सीमा पाहवा, रघुवीर यादव और जाकिर हुसैन जैसे कलाकारों ने फिल्म में जान डाल दी है।
⚠️ कमज़ोर कड़ी: ’29 तारीख’ की पहेली
हालांकि फिल्म में एक बड़ा खिंचाव ’29 तारीख’ वाली पहेली को लेकर महसूस होता है। इसे जरूरत से ज़्यादा उलझा दिया गया है, जिससे फिल्म थोड़ी धीमी और बोझिल हो जाती है। इस हिस्से को बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता था।
📜 फिल्म का सार – गीता का संदेश
फिल्म का अंत श्रीमद्भगवद्गीता के उस अमर सूत्र से होता है –
“कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो।”
जो अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी सोचता है, वही सच्चे अर्थों में इतिहास रचता है।
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