भारत में मध्यम वर्ग के लिए अपने सपनों का घर खरीदना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस मुद्दे पर गहरी बहस छेड़ दी है। उन्होंने बताया कि देश का रियल एस्टेट सिस्टम अब सुरक्षा या स्थिरता का माध्यम नहीं, बल्कि असमानता को बढ़ावा देने वाला प्लेटफॉर्म बन गया है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट के अनुसार, 59% भारतीयों ने अब घर खरीदने की उम्मीद ही छोड़ दी है, और यह कोई व्यक्तिगत विकल्प नहीं बल्कि सिस्टम की मजबूरी है। पिछले पांच सालों में भारत के आठ प्रमुख शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं — जहां 2018 में दरें ₹5,500/वर्ग फुट थीं, वहीं 2023 तक यह बढ़कर ₹11,000 हो गईं।
इसके उलट, आम वेतनभोगी की औसत सैलरी 2019 में ₹1.35 लाख से बढ़कर 2024 में मात्र ₹1.80 लाख सालाना हुई है — मात्र 33% की वृद्धि। इससे साफ है कि आम आदमी की आमदनी प्रॉपर्टी की रफ्तार के सामने कहीं नहीं टिकती।
होम लोन के पुराने फॉर्मूले अब फेल
पोस्ट में 5-20-40 के होम लोन नियम को भी अब अप्रासंगिक बताया गया है। इस नियम के अनुसार, सालाना ₹10 लाख कमाने वाला व्यक्ति ₹2 करोड़ की प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता। ऐसा करने के लिए उसे 20 वर्षों तक अपनी पूरी सैलरी बचानी होगी, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है।
काले धन और टैक्स चोरी से चल रहा है सिस्टम
पोस्ट में यह भी बताया गया कि रियल एस्टेट सेक्टर कैसे काले धन का अड्डा बन चुका है। ₹1 करोड़ की प्रॉपर्टी पर ₹32.5 लाख टैक्स लगना चाहिए, लेकिन इसे कम कीमत पर रजिस्टर्ड कराकर बाकी रकम कैश में दी जाती है। इससे सरकार को सिर्फ 10% टैक्स मिलता है और टैक्स चोरी को बढ़ावा मिलता है।
अब मकान नहीं, इन्वेस्टमेंट बना घर
आजकल अमीर लोग प्रॉपर्टी को रहने के लिए नहीं, बल्कि टैक्स बचाने और काले धन को खपाने के जरिये के रूप में देख रहे हैं। वे प्री-लॉन्च में बल्क में खरीदारी करते हैं और आम मध्यमवर्गीय खरीदार पीछे छूट जाता है।
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