कुछ लोग लाइट जलाकर सोना पसंद करते हैं तो कुछ लोगों को अंधेरे में सोना रास आता है. हालांकि हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि एक प्रेग्नेंट महिला को सोने से पहले लाइट्स डिम कर देनी चाहिए यानी कमरे की रोशनी को कम कर देना चाहिए.
अमेरिकी शोधकर्ताओं के मुताबिक, जो प्रेग्नेंट महिलाएं सोने से तीन घंटे पहले तक कई सारी आर्टिफिशियल लाइट्स के कॉन्टैक्ट में आती हैं, उनमें गर्भकालीन मधुमेह यानी जेस्टेशनल डायबिटीज के पैदा होने का खतरा ज्यादा रहता है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि रात में आर्टिफिशियल लाइट्स के कॉन्टैक्ट में आने से ऐसी महिलाओं में मेलाटोनिन नाम के हार्मोन का लेवल कम हो जाता है. यही नहीं, शरीर की आंतरिक घड़ी भी बाधित होती है. इसी का प्रभाव ब्लड शुगर के लेवल पर पड़ता है.
द सन की रिपोर्ट के मुताबिक, रॉयल कॉलेज ऑफ ओब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट की मानें तो प्रेग्नेंसी के दौरान 100 महिलाओं में से कम से कम 4 से 5 महिलाओं को यह स्थिति प्रभावित करती है. अगर इस स्थिति को अच्छी तरह से कंट्रोल नहीं किया गया तो यह शिशु के लिए भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है, जिसमें उसकी मृत्यु होना भी शामिल है.
शोधकर्ताओं ने 700 से ज्यादा महिलाओं के डेटा को ट्रैक किया कि सोने से पहले आर्टिफिशियल लाइट के कॉन्टैक्ट में आने से उनकी हेल्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है. इस शोध में पाया गया कि कुछ महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज डेवलप हुई. जो महिलाएं अपने घर में टीवी, कंप्यूटर और स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल लाइट्स की तेज रोशनी के कॉन्टैक्ट में थीं, उनमें इस समस्या के पैदा होने की संभावना 5 गुना ज्यादा थी.
डॉ मिनजी ने प्रेग्नेंट महिलाओं से अपील की है कि वे सोने से कम से कम 3 घंटे पहले तक किसी भी तेज रोशनी के संपर्क में ना आएं. उन्होंने यह भी कहा कि प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को कंप्यूटर या स्मार्टफोन का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए. जेस्टेशनल डायबिटीज के बाकी खतरों में वजन का ज्यादा होना, कम एक्टिव रहना, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम होना और परिवार के किसी सदस्य को डायबिटीज होना शामिल है.
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