गेहूं का आटा सेहत बिगाड़ रहा है? जानिए क्या कह रहे हैं डायटीशियन

भारतीय रसोई की नींव कहे जाने वाले गेहूं के आटे को लेकर हाल के दिनों में कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रोटी हमारी थाली का अहम हिस्सा होती है, लेकिन क्या आपको पता है कि यही आटा आजकल कई बीमारियों की वजह बन रहा है?

हां, यह सुनने में चौंकाने वाला ज़रूर है, लेकिन शहरों में बिक रहा परिष्कृत (refined) गेहूं का आटा — जिसे अधिक महीन और सफेद बनाने के लिए प्रोसेस किया जाता है — पोषण के नाम पर लगभग “खाली कैलोरी” बन चुका है।

आटा नहीं, सेहत पर हमला!

पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं के आटे को जब आधुनिक मिलों में प्रोसेस किया जाता है, तो उसमें मौजूद फाइबर, विटामिन बी और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि ज़्यादा रिफाइंड आटा खाने से कब्ज, मोटापा, डायबिटीज और यहां तक कि हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

जानी-मानी डायटीशियन डॉ. कावेरी वर्मा बताती हैं, “आजकल जो आटा बाजार में उपलब्ध है, वह मशीन से इतनी तेजी से पीसा जाता है कि उसकी गर्मी ही पोषण को नष्ट कर देती है। ऊपर से उसमें ब्रान (गेहूं का छिलका) निकाल दिया जाता है, जो फाइबर का मुख्य स्रोत होता है।”

तो क्या करें? आटा खाना छोड़ दें?

नहीं, गेहूं पूरी तरह खराब नहीं है। समस्या उसके प्रोसेसिंग के तरीके में है।

सही तरीके से गेहूं का आटा खाने के सुझाव:

घरों में पिसा हुआ आटा ज्यादा फायदेमंद होता है। कोशिश करें कि लोकल चक्की से मोटा आटा पिसवाएं।

आटे में चना, जौ, बाजरा या सोयाबीन जैसे अन्य अनाज मिलाएं। इससे उसका पोषण मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।

सात दिनों से ज्यादा पुराना आटा न खाएं। ताज़ा आटा पोषण से भरपूर होता है।

सफेद और बहुत महीन आटे से परहेज करें। मोटा आटा फाइबर में ज्यादा होता है, जिससे पाचन बेहतर होता है।

आटे को ठंडी जगह या एयरटाइट डिब्बे में रखें ताकि उसमें नमी और फफूंदी न लगे।

किन्हें सबसे ज्यादा खतरा?

डायबिटीज के मरीजों को रिफाइंड आटे से सबसे ज्यादा परहेज करना चाहिए। यह रक्त में ग्लूकोज को तेजी से बढ़ाता है।

कब्ज या पाचन की समस्या वाले लोगों को भी अधिक फाइबरयुक्त मोटे आटे का सेवन करना चाहिए।

वजन घटा रहे व्यक्ति रिफाइंड आटे से दूरी बनाएं, क्योंकि यह भूख जल्दी बढ़ाता है और कैलोरी नियंत्रण कठिन करता है।

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