हमारे देश में क्रिकेट जितना देखा जाता है उतना कोई और खेल नहीं देखा जाता. यही वजह है कि ज्यादातर बच्चे भी शायद सचिन, धोनी विराट की तरह क्रिकेटर ही बनना चाहते हैं. फिल्मों और विज्ञापनों में भी क्रिकेट को खूब प्रमोट किया जाता है लेकिन अब बैडमिंटन पर एक ऐसी फिल्म आई है जो बैडमिंटन पर कायदे से बात करती है. बैडमिंटन को प्रमोट करती है और इसे देखने के बाद हो सकता है थिएटर से पैरेंट्स सीधे बच्चों को बैडमिंटन दिलवाने ले जाएं. बैडमिंटन में लव ऑल का मतलब होता है नए खेल की शुरुआत और ये फिल्म भी एक नई तरह फिल्म है.
कहानी
कहानी है एक पिता सिद्धार्थ शर्मा की जो अपनी पत्नी जया यानि श्रीस्वार दुबे और बेटे आदित्य यानि अर्क जैन के साथ भोपाल में रहता है. रेलवे में काम करता है लेकिन वो अपने बच्चे को खेल से दूर रखता है और इसके पीछे की वजह से उसका अतीत. सिद्धार्थ कभी खुद बैडमिंटन चैंपियन था. ओलंपिक के लिए सेलेक्शन से ऐन पहले राजनीति का शिकार हो गया. उसपर हमला करवाया गया वो फाइनल में तो पहुंचा लेकिन हमले के बाद मिली चोट की वजह से हार गया. उसे खेल कोटा से रेलवे में नौकरी तो मिल गई लेकिन अपने साथ हुए राजनीति के खेल के दर्द को वो कभी नहीं भूल पाया. इसलिए नहीं चाहता कि उसका बेटा भी उस दर्द से गुजरे लेकिन बेटे को स्कूल में बैडमिंटन खेलना पड़ता है. मां और बेटा पिता से ये बात छिपाते हैं लेकिन एक खिलाड़ी की कहानी कब तक छिपी रहेगी. फिर क्या होता है, ये देखने के लिए थिएटर जाइए और ये फिल्म देखिए.
कैसी है फिल्म
ये बैडमिंटन पर बनी अब तक की शायद सबसे शानदार फिल्म है. फिल्म में जबरदस्ती का ड्रामा नहीं डाला गया है. फिल्म में खेल को खेल के हिसाब से दिखाया गया है. यहां आप खेल को भी समझते हैं और खेल के पीछे वाले खेल को भी. फिल्म कहीं भी अपनी पकड़ नहीं छोड़ती और एंड में खेल जीतता है. खिलाड़ी जीतता है और दर्शक भी जीतता है कि उसे एक अच्छा सिनेमा देखने को मिला.
एक्टिंग
केके मेनन ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि सिनेमा के बेहतरीन एक्टर्स में से एक हैं. इस फिल्म को देखते हुए आपको महसूस होता है कि हम खुशकिस्मत हैं कि हम केके मेनन जैसे एक्टर्स के दौर में पैदा हुए हैं. हमें ऐसी एक्टिंग, ऐसी परफॉर्मेंस देखने को मिल रही है. चाहे सख्ती वाले सीन हों या फिर इमोशनल सीन. हर सीन में केके लाजवाब हैं. केके के बेटे का रोल निभाने वाले अर्क जैन बैडमिंटन खिलाड़ी हैं लेकिन एक्टिंग के भी वो खिलाड़ी निकले. उन्होंने अच्छा काम किया है, सुमित अरोड़ा का काम भी अच्छा है जो केके के दोस्त के किरदार में हैं. श्रीस्वरा दुबे और स्वस्तिका मुखर्जी छोटी भूमिकाओं में असर छोड़ जाते हैं.
डायरेक्शन
सुधांशु शर्मा का डायरेक्शन ऑन प्वाइंट है. उन्होंने फिल्म में टेक्निकल डिटेल को मजबूत रखने के बाद भी उसे बोरिंग नहीं होने दिया है. फिल्म में पकड़ बनाए रखी है. कहानी को दिलचस्प अंदाज में कहा है. केके जैसे शानदार एक्टर के सामने उन्होने बाकी एक्टर्स से बखूबी काम निकलवाया है.
ऐसी फिल्में आपको एक मोटिवेशन देती हैं..कुछ सिखाती हैं..कुछ कहती है…ये क्या कहती हैं. थिएटर में जाकर सुन लीजिए.
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