मैदा भले ही स्वस्थ को नुकसान पहुंचाने वाला माना जाता रहा है लेकिन इसका उपयोग हर घरों में किया जाता है. कुछ ऑकेजन पर पूरियां बनानी हो तो मैदे की पूरी आप रेफर करते हैं, पिज्जा बनाना हो तो मैदे का बेस तैयार किया जाता है, ये खाने में बहुत ही टेस्टी लगता है. एकदम सफेद और बिल्कुल लजीज. यह इतना फाइन और सफेद होता है कि लोग यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि आखिर यह बनता किस चीज से है? कई लोग अपने अपने हिसाब से ख्याली पुलाव बनाते हैं..कुछ को लगता है कि यह साबूदाना बनाते समय बनाया जाता है कुछ को लगता है कि इसमें सिंथेटिक प्रोडक्ट है. लेकिन आपको बता दें कि जिस गेहूं के आटे की आप रोटी खाते हैं उसी गेहूं से ही यह मैदा बनता है अगर आपके दिमाग में यह चल रहा है कि गेहूं का आटा तो सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है तो आखिर मैदे को इतना अनहेल्दी क्यों कहा जाता है और इसे खाने की मनाही क्यों होती है? तो आइए जानते हैं इस बारे में पूरी डेटील में जानकारी
कैसे बनता है मैदा?
मोटा मोटी हम सभी जानते हैं कि गेहूं से ही मैदे बनाए जाते हैं, लेकिन गेहूं का सिर्फ सफेद हिस्सा जिसे इंडोस्पर्म कहा जाता है उसका ही इस्तेमाल होता है.यह असल में प्रोसेस और ब्लीच किया हुआ गेहूं का आटा होता है जिसे इतना प्रोसेस किया जाता है कि गेहूं का जरूरी फाइबर इसमें से दूर हो जाता है. मैदा बनाने की शुरुआत सबसे पहले गेहूं के सिलेक्शन से होती है और इसमें कई स्टेप शामिल होते हैं.
गेहूं को लेकर उसकी सफाई की जाती है. दरअसल मैदा बहुत ही फाइन और रिफाइंड प्रोडक्ट होता है इसलिए यह जरूरी है कि गेहूं की सफाई भी सही से हो की जाएं. कई फिल्टर लगाए जाते हैं और गंदगी धूल, पत्थर,हस्क सब कुछ निकल जाता है इस प्रोसेस में काफी वक्त लगता है.
अब एक बार जब गेहूं साफ हो जाता है तो इसमें से भूसी को पूरी तरह से हटाया जाता है इस प्रोसेस में सिर्फ गेहूं के दाने का ही प्रयोग होता है.
अब गेहूं को ग्राइंड किया जाता है और इसे एक बार नहीं बल्कि दो बार हाई प्रेशर रोलर से ग्राइंड किया जाता ह, ऐसे में बहुत ही महीन पाउडर निकल कर आता है इसके बाद रिफायनिंग की जरूरत होती है.
ग्राइंड करने के बाद मैदे की ब्लीचिंग और केमिकल प्रोसेसिंग की जाती है.यही वजह है कि ये गेहूं के आटे से अलग होता है और यह चिपचिपी कंसिस्टेंसी के साथ गूंथा जाता है. अगर इसे इतना प्रोसेस नहीं किया जाएगा तो यह सारी चीजें टूटने लगेंगी और ठीक तरह से बन नहीं पाएगा.
अब मैदा अलग-अलग फिल्टर प्रोसेस से होकर पैकेजिंग में जाता है .इस प्रोसेस में वह सभी पार्टिकल निकाल दिए जाते हैं जो पहले की प्रोसेसिंग में नहीं निकल पाए.पैकिंग के बाद मैं गे को बेचने के लिए मार्केट में भेजा जाता है.
मैदा सेहत के लिए क्यों फायदेमंद नहीं है
मैदा बहुत ही हेल्दी और नेचुरल इनग्रेडिएंट से बनता है लेकिन इसके सारे गुण निकाल लिए जाते हैं.
मैदे में फाइबर की मात्रा ना के बराबर होती है इस वजह से पचाने में दिक्कत होती है.
इसमें गेहूं के बिल्कुल भी गुण नहीं होते हैं और यह सिर्फ स्टार्च की तरह होता है इसलिए इसे ज्यादा खाने से परेशानी हो जाती है.
मैदा खाया जाए तो मोटापे की परेशानी बढ़ जाती है.आंत की भी दिक्कत हो जाती है.
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